Sunday, 1 February 2015

Hindi Grammer

                                                   हिंदी व्याकरण 

संपादक : जी. विजय कुमार 
वर्ण

वर्ण भाषा की सबसे छोटी इकाई है, जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते I  मूल रूप से वर्ण वे चिह्न है जो हमारी मुखे से निकली ध्वनियों को लिखित रूप देते है I

जैसे :- राम (र् + आ + म् + अ )

वर्णमाला : वर्णो का समूह वर्णमाला कहलाता हैं I


उच्चारण के आधार पर वर्ण भेद

उच्चारण के आधार पर इन्हे दो भागो में बांटा गया हैं I

१. स्वर
२. व्यंजन  

१. स्वर :-          स्वर उन वर्णो को कहते हैं जिनका उच्चारण करते समय  हवा मुख से बिना किसी रूकावट के निकल जाती हैं I

स्वरों की संख्य़ा ग्यारह हैं I  अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ,ए, ऐ ,ओ, औ I

स्वरो के भेद

उत्पत्ति के अनुसार स्वरो के दो भेद हैं I
१. मूल स्वर
२. संधि स्वर

१. मूल स्वर :- जिन स्वरों उत्पत्ति अन्य स्वरों से नहीं होती हैं , वे मूला स्वर कहलाते हैं I
मूल स्वर चार हैं - अ , इ ,उ , ऋ

२. संधि स्वर :- जिन स्वरों की रचना मूल स्वरों के संयोग से होती हैं, वे संधि स्वर कहलाते हैं i  संधि स्वर सात हैं -

अ + अ = आ                        इ + इ = ई
उ +  उ = ऊ                         अ + इ = ए
अ + ए = ऐ                          अ + उ = ओ
अ + ओ = औ

जिन वर्णो का उचचारण स्वर की सहायता से होता है, व्यंजन कहलाता है I

व्यंजन के भेद

१. स्पर्श व्यंजन
२. अंतस्थ व्यंजन
३. उष्म व्यंजन


१. स्पर्श व्यंजन :-          जिन वर्णो का उच्चारण  करते समय जिह्वा मुख़ के विभिन्न भागो को स्पर्श करति है, स्पर्श व्यंजन कहलाते है I
स्पर्श व्यंजन में पाँच वर्ण होते हैं :-

क् वर्ग, च वर्ग,ट वर्ग , त् वर्ग, प् वर्ग

२. अंतस्थ व्यंजन :- इनका उच्चारण करते समय जिह्वा मुख के किसी भी भाग से स्पर्श नही करती I
य् , र् , ल्  तथा  व् अंतस्थ व्यंजन हैं I

३. उष्म व्यंजन :-    इनका उच्चारण करते समय एक प्रकार की उष्म उत्पन्न होती हैं I
श  ष , स तथा ह . उष्म व्यंजन हैं I 

वर्ण विच्छेद

इसका अर्थ किसी शब्द या ध्वनि समूह के वर्णो को अलग - अलग लिखना होता हैं I

जैसे :-
कमल = क् + अ + म् + अ + ल् + अ
अश्व = अ + श + व् + अ

'र्' के विभिन्न रूप

१. 'र्' के साथ ' उ ' या 'ऊ' की मात्रा

(अ).  'र्' के साथ ' उ ' की मात्रा लगने पर रु बनता  हैं I

जैसे :- र + उ = रु  (गुरु , रुपया)
(आ) . 'र्' के साथ  'ऊ' की मात्रा लगने पर रू बनता  हैं I
जैसे :- र + ऊ = रू (शुरू , रूप)

२. रेफ लेखन की स्थिति

'र्' हलंत अर्थात स्वर रहित होता हैं तो 'र'  रेफ बनकर अलग व्यंजन के सिर पर लगता हैं I
जैसे :- निर्मल = नि + मल

         निर्भय = निर + भय 

३. जब र से पहला व्यंजन हलंत युक्त होता हैं तो र से पहला वर्ण पूरा लिखा जाता हैं और र का रूप विकृत हो जाता हैं I
जैसे :-
पाई वाला व्यंजनों के बाद
'र' पाई के नीचे तिरछा होकर प्रयोग होता हैं I 
जैसे :- क्रोध , क्रिया
बिना पाई वाला व्यंजनों के बाद
'र'  व्यंजन के नीचे इस रूप में प्रयोग  होता हैं I 
जैसे :- ट्रक , ट्रस्ट

४. त् और श के बाद र का लेखन
त् के बाद र आने पर 'त्र' संयुक्तक्षर बनता हैं I
जैसे :- त्रिशूल, त्रिभुज 
श के बाद र का लेखन :- श्र

छः अन्य चिह्न

१. अनुस्वार (.) :- स्वर के ऊपर जो एक बिंदी लगाई जाती है वुसी अनुस्वार कहते हैं I 
जैसे :- अंग, अंगूर, मंद, पंकज आदि I

२. अनुनासिका ( ) :- यह अनुस्वार का ही हल्का रूप हैं I  इसके द्वारा अनुस्वार का आधा (या कोमल ) उच्चारण होता हैं I 
जैसे :- उँगली , अंगूठी आदि I

३. विसर्ग (:) :- वर्ण के आगे (परे) दो बिंदियाँ  लगाईं जाती है , जिनका आधे ह् जैसा उच्चारण होता है I
इन्हे विसर्ग कहते है I
जैसे :- दुःख, प्रातःकाल , पुनः, आदि I

४. निम्नबिन्दु (.) :- कुछ व्यंजनों के नीचे बिन्दु लगाकर मूल व्यंजनों से कोमल व्यंजन बनाया जाता है I  इसे निम्नबिन्दु  कहते हैं I
जैसे :- पड़ा, चढ़ इनमें ड से ड़ तथा ढ से ढ़ बना लिया गया हैं I

५. अर्ध चंद्र :- अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में लिखते हुए 'आ' तथा 'औ'
की मध्यवर्ती ध्वनि को प्रकट करने के लिए 'आ' के ऊपर  ऐसा चिह्न लगाया जाता हैं I
जैसे :- कॉलेज, आक्सफोर्ड I एसे शब्द हिंदी में अधिकांशता यूरोपीय भाषाओ से अंग्रेजी के माध्यम से आए हैं I

६. हल् का चिह्न या हलंत ( ) :- यदि किसी व्यंजन में कोई स्वर न मिला हुआ हो तो उस व्यंजन के नीचे तरफ तिरछी लकीर खींच देते हैं, जिसमे पता चलता हैं कि उस व्यंजन में स्वर नहीं हैं I
जैसे :- राजन् में 'न्' और पश्चात्  में 'त् ' हालत युक्त हैं I 
बाह्य प्रयत्न के आधार पर हिंदी वर्णमाला को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

१. अघोष वर्ण
२. घोष अथवा सघोष वर्ण

१. अघोष वर्ण :-  इन वर्णो के उच्चारण में केवल सॉस का उपयोग होता है और कोई विशेष नाद नहीं निकलता I इनके उच्चारण में स्वर- तंत्रीय याक दूसरी से इतनी दूर हट जाती है कि उनके बीच से निकलनेवाली हवा स्वर- तंत्रियों से बिना टकराए और कम्पन किए निकल जाती है और घोष. (नाद) उतपन्न नहीं करती I
इसमें व्यंजनो के प्रत्येक वर्ग के प्रथम दो  व्यंजन (का -ख , च- छ , ट - ठ, त - थ, प- फ और श,ष,स)आते है I  

२. घोष अथवा सघोष वर्ण  :- इन वर्णो के उच्चारण में दोनों स्वर-तंत्रिया याक दोसरे के इतनी निकट आजाती  है कि मुख-प्रकोष्ट में प्रवेश करनेवाली वायु घर्षण और कंम्पन के साथ नाद करती हुई निकलती है I  स्वर- तंत्रियों के कम्पन के कारण वर्णो  के उच्चारण में घोष या नाद उतपन्न होता है I
इन वर्गों में सब वर्गों के तीसरे, चौथे और पाचवे वर्ण (ग-घ- , ज- झ- ड, ढ-ण-,द-ध-न,ब-भ-म, तथा य,र,ल,व,ह और सभी स्वर) सम्मिलित है I

प्राणत्व के आधार पर वर्ण

प्राणत्व (ववयु कि मात्रा) के आधार पर वर्णो को दो भागो में विभाजित किया जा सकता है -
१. अल्पप्राण वर्ण
२. महाप्राण वर्ण

१. अल्पप्राण वर्ण :- इन वर्णो के उच्चारण में प्राणवायु कम शक्ति लगाने से ही बहार निकलती और ध्वनि उतपन्न करती है I  इनमे निम्नलिखित वर्ण सम्म्लित है I
 वर्गों के प्रथम, तृतीया और पंचम वर्ण -
   क वर्ग - क, ग , इ                              च वर्ग - च , ज , ञ
   ट वर्ग -  ट, ड, ण                              त वर्ग - त , द  न
   प वर्ग -  प, ब , म    
वर्णमाला के सभी स्वर I

२. महाप्राण वर्ण :- इन व्यंजन में ह् कार कि ध्वनि सुनाई होती है और उच्चारण में अल्पप्राण कि अपेक्षा अधिक शक्ति लगनी पड़ती है I 
जैसे :-   क + ह = ख , च + ह = छ , ट + ह = ठ, त + ह = थ, प + ह = फ I
ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ , ध, फ, भ और श,ष,ह इस वर्ग के व्यंजन है I

इसके अतिरिक्त व्यंजनो के धो भेद और है -
१. उत्क्षिप्त व्यंजन
२. प्रकम्पित वर्ण

१.उत्क्षिप्त व्यंजन : - उत्क्षिप्त का अर्थ है फेंका हुआ I  इस वर्ग के डऔर ढ हैं I इनके उच्चारण के समय जीभ की नॉक को तालू से सटाकर फिर झटके में नीचे फेंकते हैं I

२. प्रकम्पित वर्ण :- इस प्रकार का वर्ण र हैं I  इनके उच्चारण के समय जिह्वा का अग्रभाग तालू के निकट चला जाता हैं और मुख प्रकोष्ट से निकलनेवाली हवा अपने प्रवाह में  जिह्वा में कम्पन उत्प्न्न कर देती हैं I  रा का उच्चारण करके देखिए कि जीभ किस प्रकार कम्पन करती हैं I 



 
                                           शब्द विचार

परिभाषा:-     एक या अधिक वर्णो से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि ‘शब्द’ कहलाता है I
 जैसे:-  एक वर्णो से निर्मित शब्द - न (नहीं) , व (और)
          अनेक वर्णो से  निर्मित शब्द - कमल, लकड़ी रमेश परमात्मा I

शब्द - भेद
बनावट के आधार पर शब्द के निम्नलिखित तीन भेद है I
१. रूढ़
२. यौगिक
३. योगरूढ़ 

१. रूढ़ :-           जो शब्द किन्ही अन्य शब्दो के योग से और किसी विशेष अर्थ को प्रकट करते हों, वे रूढ़ कहलाते हैं I
जैसे:-  कम, पर I  इनमे क, म, प, र का टुकड़े करने पर कुछ अर्थ नहीं हैं I  अतः ये निरर्थक हैं I  

२. यौगिक:-      जो शब्द कई सार्थक शब्दों के मेल से बने हों , वे यौगिक शब्द कहलाते हैं I 
जैसे:-  देवालय - देव + आलय
        हिमालय - हिम + आलय
ये सभी शब्द दो सार्थक शब्दों के मेल से बने हैं I  

३. योगरूढ़  :-   वे शब्द यौगिक  तो हैं, किन्तु सामान्य अर्थ को न प्रकट कर किसी विशेष अर्थ को प्रकट करते हैं,                        योग रूढ़ कहलाते हैं I
जैसे :- पंकज, दशानन आदि I  पंक + ज सामान्य अर्थ में प्रचलित न होकर कमल के अर्थ में रूढ़ हों गया हैं I

उत्पत्ति के आधार पर शब्द - भेद

  उत्पत्ति  के आधार पर शब्द के निम्नलिखित चार भेद है I

१. तत्सम :- जो शब्द संस्कृत भाषा से हिंदी में बिना किसी परिवर्तन के ले लिए गए हैं वे   तत्सम कहलाते हैं I
जैसे :- अग्नि, क्षेत्र , वायु ,रात्रि , सूर्य आदि

२. तदभव :-  जो शब्द रूप बदलने के  बाद  संस्कृत से हिंदी में आए हैं वे तदभव कहलाते  हैं I
जैसे :- आग (अग्नि) ; खेत (क्षेत्र) , रात ( रात्रि)  सूरज (सूर्य) आदि I 

३. देशज :- जो शब्द क्षेत्रीय प्रभाव के कारण परिस्थिति व आवश्कतानुसार बनकर प्रचलित हो गए हैं , वे देशज कहलाते  हैं I
जैसे :- पगड़ी, गाड़ी, थैला, पेट  खटखटाना आदि I 

४. विदेशी या विदेशज  :- वेदेशी जाती संपर्क में उनकी भाषा के बहुत से शब्द हिंदी में प्रयुक्त होने लगे हैं I
एसे शब्द वेदेशी अथवा विदेशज शब्द कळते हैं I
जैसे :- स्कूल, अनार, आम पुलिस, टेलीफोन,  आदि I 


प्रयोग के आधार पर शब्द भेद

प्रयोग के आधार पर शब्द के  निम्नलिखित आठ भेद हैं I

१. संज्ञा                                      ५. क्रिया - विशेषण
२. सर्वनाम                           ६.  संबंधबोधक
३. विशेषण                           ७.  समुच्चय बोधक
४. क्रिया                              ८.  विस्मयादि बोधक

इन उपयुक्त आठ प्रकार के शब्दों को भी विकार के दृष्टि से दो भागों में बांटा जा सकता हैं I

१. विकारी
२. अविकारी 
१. विकारी शब्द : -  जिनि शब्दों का परिवर्तन होता रहता हैं वे विकारी शब्द कहलाते हैं I

जैसे:- कुत्ता, कुत्ते, कुत्तो, मै , मुझे, हमें, अच्छा,, अच्छे  खाता हैं , खाती हैं, खाते हैं आदि

२. अविकारी शब्द :- जिन शब्दों के रूप में कभी कोई परिवर्तान नहीं होता हैं  वे अविकारी शब्द कहलाते हैं I
जैसे:- यहां , किन्तु, नित्य, और, हे , हरे आदि I  इनमें क्रिया - विशेषण, सम्बंद बोधक और  विस्मयादि बोधक
 आदि हैं I

अर्थ के  दृष्टि से शब्द भेद

अर्थ के  दृष्टि से शब्द के दो भेद है I
१. सार्थक
२. निरर्थक

१. सार्थक :-      जिन शब्दों का कुछ - न - कुछ अर्थ हो , वे सार्थक शब्द कहलाते है I
जैसे :- रोटी, पानी आदि I 

२. निरर्थक :-    जिन शब्दों का कोई अर्थ नही होता है , वे शब्द  निरर्थक कहलाते है I
जैसे :- रोटी - वोटि , पानी - वानि इनमे वोटि , वाणी आदि शब्द निरर्थक शब्द है I

https://amzn.to/2P63r8a

2 comments:

  1. में सोचता था हुँ कि प्रेम में प आधा है र पूरा है । जो र पूरा है वह र अपना अ प हो सपोर्ट करके र्रिर के रूप में प में लग जाता है । इसी प्रकार राष्ट्र में र पूरे में बड़े आ की मात्रा जुड़ी है और आधा ष है ,आधा ट है और पूरा र है । इस प्रकार से पहले र अपना अ ट को देता है और र की र्रिर ट में लग जाती है । मगर ट को जो अ का सपोर्ट मिला था वह ष को दे देता है इस प्रकार फिर से ट आधा रह जाता है ,इसी लिए ट में र की र्रिर के बाजू में हलंत लगते है । मगर यही बात ट्रक में लागू नहीं होती है और आप ट्रक के विषय मे नियम लगाते है वह राष्ट में लागू नहीं होता है ।क्रपया स्पष्ट करें ।

    ReplyDelete